Wednesday, 19 June 2013

युद्ध अन्याय के विरुद्ध

जय हिन्द,

           यह बहुत अच्छी बात है कि कोई व्यक्ति महत्वाकांक्षी हो। और अपनी योग्यता के अनुरूप कमाये खर्च करे। दुनिया भर में घूमे। अपने प्रभाव क्षेत्र में बढ़त हासिल करे। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाये इसके लिए आवश्यक धन कमाये और रोजगार इत्यादि स्थापित करे। ये किसी के बहुत अच्छे होने के लक्षण हैं। लोगों में ऐसा करने की सोच होनी ही चाहिये। ये सब व्यक्तिगत तौर पर सही भी लगता है। यदि ये सन्दर्भ सरकार के स्तर पर देखा जाये तो सरकार का विश्व स्तर पर महत्वाकांक्षी होना तो ठीक परन्तु इसके लिये प्रजा के हितों की बलि चढ़ाना कोई समझदारी नहीं है और प्रजा के लिये कुछ भी नहीं करना यह तो बिल्कुल ही गलत है।

          मेरा मानना है कि सरकार के कार्यों में मुख्यरूप से अपनी प्रजा की सुख सुविधाओं का ध्यान रखना ही एक मात्र लक्ष्य होना चाहिये और सरकारी धन का उपयोग जन हित में ही होना चाहिये जैसे लोगों की भूख, प्यास, बीमारी, आवागमन, शिक्षा, सुरक्षा आदि सुविधाओं के लिए होना चाहिये। उन्हें ये सारी सुविधायें मुफ्त में मिलनी चाहिये।

         परन्तु आज सरकार लोभी और मुनाफाखोर व्यापारी की तरह व्यवहार कर रही है। जो एक अच्छे शासक के लक्षणों से बिलकुल अलग है। ऐसा होना प्रजातंत्र के लिये घातक है। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग अपने पद का दुरुपयोग करके सार्वजनिक धन एवं संसाधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं। जबकि उनका नैतिक कर्त्तव्य है कि वे जनता का ध्यान वात्सल्य भाव से करें और उन्हें समुचित सुविधायें मुहैया करायें।

          सरकार का यह रवैया कि जनता के संसाधनों को जनता के लिये उचित मूल्य में देकर अत्यधिक मुनाफा में सरकार जनता को ही बेच रही है। यह समझ से परे है कि सरकार अपनी प्रजा से ही क्यों मुनाफा वसूली कर रही है। सरकार इतने धन को क्यों और किसके लिये इकट्ठा करना चाहती है। सरकार को तो कम से कम मूल्य में अपनी प्रजा को संसाधन उपलब्ध कराने चाहिये ताकि प्रजा का जीवन स्तर सुधरे। य्हाँ मूल्य वृद्धि के कारण प्रजा का जीवन स्तर और बदतर होता जा रहा है। जबकि यह सरकार का कर्त्तव्य है कि वह समस्त निर्णय प्रजा हित में ले कि प्रजा को लूटने के लिये।

          विचार्णीय प्रश्न यह है कि जब सरकार प्रजा के लिये है तो प्रजा हित को ही सर्वोपरी रखना चाहिये। फिर क्यों प्रजा के संसाधनों का दुरुपयोग कर रही है और प्रजा से ही उसकी मालिक बनकर उसके संसाधनों की कीमत वसूल रही है। सबसे पहले हम देखते हैं कि सरकार को इतने धन की आवश्यकता क्यों है।

         सरकार के पास इस धन के दो उपयोग हैं एक जनता को सुविधायें देने के लिये दूसरे सरकार में बैठे लोगों की महत्वाकांक्षा की पूर्ती करने के लिये। इसमें पहले जनता को कम मूल्य का अनाज और सब्सिडी देने के लिये, जल परियोजनाओं को चलाने के लिये, इलाज और अस्पतालों को विकसित करने के लिये, आवागमन और संचार साधनों को जुटाने के लिये, शिक्षा की बेहतरी के लिये एवं देश की सुरक्षा के लिये धन की आवश्यकता होती है। ये सारी चीजें और सुविधायें भारत के प्रत्येक नागरिक को उसकी आवश्यकता के अनुरूप मिलती हैं। ये जनता के सौ प्रतिशत लोग हैं। अब इन्हीं में से सरकार में बैठे लोग जो मात्र दो प्रतिशत ही हैं इनका भी ध्यान सरकार को रखना पड़ता है। ये वे महत्वाकांक्षी लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षा पुराने जमाने के राजाओं की तरह है। ये अपना स्तर राजाओं और महाराजाओं की तरह रखते हैं और इनकी पूर्ति जनता के धन और संसाधनों से होती है। इस तरह सरकार को अपने बजट में इन सभी का ध्यान रखना पड़ता है और जायज तरीकों से वेतन इत्यादि के रूप में इस धन का वितरण सुनिश्चित करना पड़ता है। ये तो हाथी के वे दाँत हैं जो दिखावे के लिये होते हैं और इन दाँतों को देखकर लगता है कि सरकार कुछ भी गलत नहीं कर रही है।

          आपने देखा होगा कि जब भी सरकार अपनी नीति को प्रजा के सामने प्रस्तुत करती है तब प्रस्तुतकर्त्ता के हाव भाव से ऐसा लगता है कि वह जनता को मूर्ख बना रहा है। क्योंकि इनका असली खेल तो पर्दे के पीछे चल रहा है। वो इस तरह कि सरकार जनता को संसाधन जुटाने के नाम पर खरीद करती है। हमारे कुछ महत्वाकांक्षी व्यवसायी सरकार को चीजें और संसाधन जुटाने में मदद करते हैं और उन वस्तुओं एवं संसाधनों को टेण्डर प्रक्रिया के माध्यम से पूर्ती करने की व्यवस्था देते हैं। और यहीं से लूट शुरू हो जाती है।

          इस मार्केट में दो संस्थान होते हैं एक खरीदार (सरकार) और दूसरा बेचवार (ठेकेदार) ये दोनों मिलकर जनता के पैसों से जन सुविधाओं के नाम पर चीजें खरीदते और बेचते हैं। बात बिल्कुल सीधी लग रही है परन्तु ये ऐसी है नहीं। जब सरकार के किसी विभाग में खरीदी होती है तो टेण्डर निकाले जाते हैं। नीलामी के लिये इनके इश्तहार विभिन्न संचार माध्यमों में प्रकाशित कराये जाते हैं। कई बार जिन चीजों का टेण्डर निकलना और कैसे उसकी आपूर्ति होनी है जान लेता है। इसमें जो चालाक और महत्वाकांक्षी ठेकेदार होते हैं वे टेण्डर प्रक्रिया की जड़ में भी शामिल होते हैं और प्रक्रिया में शामिल हर एक अधिकारी, प्राधिकारी से समन्वय होता है और आपस में साँठ गाँठ करके करीब 30% मूल्य की वस्तु को 70% भृष्टाचार से जनता के लिये 100% मूल्य में बेच दी जाती है। और उस 70% जनता के धन का आपसी बँटवारा हो जाता है। यह वो प्रक्रिया है जो सरकार करती रहती है। परन्तु अब थोड़ा सुधार हुआ है कि जनता के 70% धन का बँटवारा करने की जरूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि अब सरकार और ठेकेदार दोनों एक ही हैं। अब सारा धन सत्ता से जुड़े लोगों की जेब में जाता है। और जनता मुँह देखती रह जाती है। कुछ कहना चाहे भी तो उसे पुलिस इत्यादि के जोर पर चुप करा दिया जाता है।

          इसीलिए आपने देखा होगा कि सरकार हर उपक्रम को प्राइवेट क्यों कर रही है और सरकारी नियंत्रण को क्यों खत्म कर रही है? वो इसलिए कि जनता के धन का सीधे सत्ता में बैठे लोगों को फायदा मिले। निजीकरण के कारण सरकार जिम्मेदारी से बच जाये और जनता को निचोड़ने का कार्य बखूबी कर सके और सत्ता का हाथ दिखायी ही दे। इस तरह सरकारी लूट बेरोक टोक चलती रहती है। सत्ता और समाज सेवा को व्यवसाय की तरह किया जा रहा है। इसलिए राजनीति से जुड़े लोग अपनी भावी पीढ़ी को भी राजनीति में घसीट रही है किसी को तो डॉक्टर और इंजीनियर बना रही है वो या तो राजनैतिक या ठेकेदारी के काम में लगा रही है। हर एक कार्य में सरकार अपना और अपने से जुड़े लोगों के हितों का ज्यादा ध्यान रख रही है। जनता के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। राजनीति को लोगों ने व्यवसाय बना लिया है। कोई भी कार्य बिना भृष्टाचार के असम्भव कर दिया गया है। ईमानदारों को जेल में और बेईमानों को सत्ता में रखा गया है यह हमारा दुर्भाग्य है।

          हमारे ऊपर होने वाले अन्याय में मुख्य रूप से सरकारी तंत्र है जिसके अविवेक पूर्ण निर्णय हमें सर्वाधिक आघात लगाते हैं। आज किसी भी तरह की मँहगाई को रोकने में सरकार का ढुलमुल रवैया और सत्ता से जुड़े लोगों को फायदा पहुँचाने की नीयत जनता को समुचित लाभ देने से रोकती है। यहीं से हम पर अन्याय शुरू हो जाता है। हमारे देश में हमारे करोड़ों भाईयों के पास पर्याप्त जीवन निर्वाह के न्यूनतम साधन भी नहीं हैं। ऐसे में भी सरकारें खजाने और जेबों को भरने में लगी हैं अपने लोगों को फायदा पहुँचाने में लगीं हैं। हाँ वे खजाना भरें परन्तु जनता की भूख, प्यास, बीमारी, आवागमन, शिक्षा एवं सुरक्षा आदि सुविधाओं की समुचित व्यवस्था करने के बाद। नहीं तो बेमतलब है कि बैंक में करोड़ों पड़े हैं पर यहाँ खाने के लाले पड़े हैं। ये समस्याओं का भंडार हो गया बगैर निदान के समस्या दिखाना लोगों को भ्रम में डालना है और ऐसी बगैर हल की समस्याओं से हम रोज लड़ते है पर हल किसी के पास नहीं होता।
          इस तरह के सरकारी अन्याय से लड़ने के लिये हमारा एक सुनियोजित संगठन होना ही चाहिये जो प्रत्येक व्यक्ति की सामान्य जीवन शैली को सुनिश्चित कर सके। अब आपका प्रश्न हो सकता है कि देश में इतने सारे संगठन एन जी तो हैं तो नये की आवश्यकता क्यों? ऐसे कई और सवाल हो सकते हैं मेरा निवेदन है कि आप मुझसे प्रश्न पूछें ताकि संगठन में कोई कमी रहे। भारत में संगठनों की कोई कमी नहीं है। परन्तु इनका स्वरूप इतना वृहद है कि वे प्रत्येक व्यक्ति का कम खर्च में ध्यान ही नहीं रख सकते इन संगठनों से जुड़ने के लिये हमें दान इत्यादि देना पड़ सकता है। जबकि हम बगैर किसी खर्च के जनता को सारी सुविधायें देना चाहते हैं। हम ऐसा कोई पैसा या फंड इकट्ठा नहीं करना चाहते जो हमारे किसी भी सदस्य को भृष्ठ या बेईमान बना दे क्योंकि हर तरह के फंड लोगों की नीयत बिगाड़ देते है
           इस संगठन की संरचना इस तरह होगी कि प्रत्येक नागरिक को सारी सुविधायें उसके अपने घर पर ही मुफ्त में मिलें चाहे वो किसी भी स्तर की क्यों हों। हमारे संगठन की संरचना निम्न प्रकार होगी......
हमारे संगठन में आस पास के दस परिवारों से एक पंचायत का गठन होगा इन परिवारों का प्रत्येक सदस्य ही इस पंचायत का पंच होगा इसमें रंग, जाति , ऊँच- नीच, अमीर- गरीब आदि का कोई भेद नहीं होगा। सबके समान अधिकार होंगे। सारे पंच मिलजुल कर अपने पंचायत क्षेत्र ( जहाँ उन सदस्य परिवारों के घर बने हुये हैं), की सुख सुविधाओं को सुनिश्चि्त करेंगे। इस तरह दस दस परिवारों की पंचायतों का गठन पूरे गांव में कर देंगे। सभी पंच अपने बुजुर्गों के आशीर्वाद से अपने दैनिक कार्यों को सामान्य ढंग से ही करेंगे और प्रत्येक पंच को सम्मान देंगे।

           इन्हीं परिवारों के बुजुर्ग और पढ़े लिखे पंचों के द्वारा अपनी पंचायत क्षेत्र की न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था देखेंगे। और प्रत्येक समस्या को अपने स्तर पर ही सुलझाने की कोशिश करेंगे जरूरत पड़ने पर ही सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी की सहायता लेंगे। अपने क्षेत्र में होने वाली प्रत्येक गतिविघि पर जिम्मेदारी पूर्वक नजर रखेंगे यदि कोई सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थान द्वारा कोई ऐसी गतिविधि जो पंचायत अनैतिक अथवा गलत समझती है की शिकायत उक्त विभाग के सक्षम अधिकारी से करके उचित समाधान करायेगा। अवैध गतिविधि में लगे किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जायेगा तत्काल कार्यवाही कराई जायेगी। संगठन धरना, प्रदर्शन, हिंसा इत्यादि से दूर रहेगा
           इनका विस्तार एवं कार्यक्षेत्र दस परिवारों का निवास क्षेत्र ही होगा आवश्यकता पड़ने पर अन्य पंचायतों के सहयोग से ग्राम, नगर, तहसील, ब्लॉक , जिला, सम्भाग, प्रान्त अथवा राष्ट्रीय स्तर तक विस्तार किया जा सकता है यह समस्या के स्तर पर निर्भर करेगा। प्रत्येक पंच की सम्मान पूर्वक सामान्य जीवन शैली को बिना किसी भेद भाव के सुनिश्चित करना ही पंचायत का उद्देश्य है। यह संगठन पूर्ण रूप से लचीला है इसमें सकारात्मक सुझावों और संगठन की मजबूती के लिये परिवर्तन किये जा सकते हैं।
 जय भारत.............

 

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